Saturday, 6 December 2008

मेरा घर आज से तुम्हारा है……

बुरी तरह जले ज़माना है ।
मेरे घर उनका आना-जाना है ॥

रात-दिन उनके ही बारे मे सोचता है ये …
दिल तो बस नाम का हमारा है ॥

जब भी आओगे , इज़ाफ़ा उम्र मे होगा ।
ज़िक्र हर बात मे तुम्हारा है ॥

पैर रखते हैं ज़मीं पर वो बडी नज़ाक़त से…
उनके क़दमों मे दिल हमारा है ॥

अब जो आना तो आना हमेशा के लिये ।
बिन तुम्हारे नही ग़ुज़ारा है ॥

बिखरा-बिखरा सा रहता है……सजा दो इसको ।
मेरा घर आज से तुम्हारा है ॥

Thursday, 16 October 2008

दर्द

दर्द का कोई पैमाना कँहा होता है !
ये वो मेहमान है जिसका जाना कँहा होता है !!

भूल तो जाता मैं अपने माँझी को !
मगर जँहा मै ऐसा ऐब कहाँ होता है !!

यूँ तो मिल भी गयीं हैं कई किश्तियाँ अपने साहिल से !
खैर ऐसा वाक्या अपने साथ कँहा होता है !!

इज़ाज़त-ए-तहज़ीब-ए-ज़ेहन हमें ना थी काफ़िर !
वरना दीवाना हम सा कँहा होता है !!

कतरा के निकल जाते हैं हमें देख के वो !
जो कहते थे कभी दिन हमसे शुरू होता है !!

यूँ तो ओढ ली है बेशर्मी की चादर हमने !
पर खुदा से कुछ भी छुपा कँहा होता है !!

हँसी है दर्द का एक और मिज़ाज़ !
ये तो हम जैसा है …… जुदा कँहा होता है !!